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mahabharat 9.5.8-9: ब्रह्मन्! पाण्डवों का हित करने में सदैव तत्पर रहने वाले श्रीकृष्ण मेरे पास दूत बनकर आये, किन्तु मैंने हृषिकेश को धोखा दिया। मेरा कर्म अविचारपूर्ण था। अब वे मेरी बात कैसे मानेंगे?॥ 8-9॥   |   mahabharat अध्याय 9.5: दुर्योधनका कृपाचार्यको उत्तर देते हुए सन्धि स्वीकार न करके युद्धका ही निश्चय करना   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 5: दुर्योधनका कृपाचार्यको उत्तर देते हुए सन्धि स्वीकार न करके युद्धका ही निश्चय करना  »  श्लोक 8-9
 
 
श्लोक  9.5.8-9 
तथा दौत्येन सम्प्राप्त: कृष्ण: पार्थहिते रत:॥ ८॥
प्रलब्धश्च हृषीकेशस्तच्च कर्माविचारितम्।
स च मे वचनं ब्रह्मन् कथमेवाभिमन्यते॥ ९॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्मन्! पाण्डवों का हित करने में सदैव तत्पर रहने वाले श्रीकृष्ण मेरे पास दूत बनकर आये, किन्तु मैंने हृषिकेश को धोखा दिया। मेरा कर्म अविचारपूर्ण था। अब वे मेरी बात कैसे मानेंगे?॥ 8-9॥
 
Brahman! Shri Krishna, who is always ready to do good for the Pandavas, came to me as a messenger, but I deceived Hrishikesh. My action was thoughtless. Now how will he listen to me?॥ 8-9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)