श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 5: दुर्योधनका कृपाचार्यको उत्तर देते हुए सन्धि स्वीकार न करके युद्धका ही निश्चय करना  »  श्लोक 37-38
 
 
श्लोक  9.5.37-38 
मुदा नूनं प्रपश्यन्ति युद्धे ह्यप्सरसां गणा:॥ ३७॥
पश्यन्ति नूनं पितर: पूजितान् सुरसंसदि।
अप्सरोभि: परिवृतान् मोदमानांस्त्रिविष्टपे॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
निश्चय ही अप्सराएँ युद्ध में प्राण त्यागने वालों को बड़ी प्रसन्नता से देखती हैं। पितरों को भी देवताओं की सभा में उनका सम्मान होता हुआ दिखाई देता है। वे स्वर्ग में अप्सराओं से घिरे हुए आनंद मनाते हुए दिखाई देते हैं।
 
‘Certainly the Apsaras gaze with great pleasure at those who sacrifice their lives in battle. The ancestors surely see them being honoured in the assembly of the gods. They are seen rejoicing in heaven surrounded by Apsaras.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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