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mahabharat 9.5.33: जो महान् यज्ञों को करके वन में या युद्ध में अपना शरीर त्यागता है, वह क्षत्रिय पद को प्राप्त होता है॥ 33॥   |   mahabharat अध्याय 9.5: दुर्योधनका कृपाचार्यको उत्तर देते हुए सन्धि स्वीकार न करके युद्धका ही निश्चय करना   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 5: दुर्योधनका कृपाचार्यको उत्तर देते हुए सन्धि स्वीकार न करके युद्धका ही निश्चय करना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  9.5.33 
अरण्ये यो विमुच्येत संग्रामे वा तनुं नर:।
क्रतूनाहृत्य महतो महिमानं स गच्छति॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
जो महान् यज्ञों को करके वन में या युद्ध में अपना शरीर त्यागता है, वह क्षत्रिय पद को प्राप्त होता है॥ 33॥
 
He who after performing great sacrifices gives up his body in the forest or in a battle, attains the greatness of a Kshatriya.॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)