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श्लोक 9.5.33  |
अरण्ये यो विमुच्येत संग्रामे वा तनुं नर:।
क्रतूनाहृत्य महतो महिमानं स गच्छति॥ ३३॥ |
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| अनुवाद |
| जो महान् यज्ञों को करके वन में या युद्ध में अपना शरीर त्यागता है, वह क्षत्रिय पद को प्राप्त होता है॥ 33॥ |
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| He who after performing great sacrifices gives up his body in the forest or in a battle, attains the greatness of a Kshatriya.॥ 33॥ |
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