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mahabharat 9.5.31: इस संसार में कोई भी सुख स्थायी नहीं है। फिर राष्ट्र और यश कैसे स्थायी रह सकते हैं? यहाँ यश अर्जित करना आवश्यक है और यश युद्ध के अतिरिक्त किसी अन्य उपाय से प्राप्त नहीं होता॥31॥   |   mahabharat अध्याय 9.5: दुर्योधनका कृपाचार्यको उत्तर देते हुए सन्धि स्वीकार न करके युद्धका ही निश्चय करना   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 5: दुर्योधनका कृपाचार्यको उत्तर देते हुए सन्धि स्वीकार न करके युद्धका ही निश्चय करना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  9.5.31 
न ध्रुवं सुखमस्तीति कुतो राष्ट्रं कुतो यश:।
इह कीर्तिर्विधातव्या सा च युद्धेन नान्यथा॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में कोई भी सुख स्थायी नहीं है। फिर राष्ट्र और यश कैसे स्थायी रह सकते हैं? यहाँ यश अर्जित करना आवश्यक है और यश युद्ध के अतिरिक्त किसी अन्य उपाय से प्राप्त नहीं होता॥31॥
 
‘There is no happiness in this world that lasts forever. Then how can a nation and fame remain permanent? Here one must earn fame and fame cannot be achieved by any other means except war.॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)