श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 5: दुर्योधनका कृपाचार्यको उत्तर देते हुए सन्धि स्वीकार न करके युद्धका ही निश्चय करना  »  श्लोक 29-30
 
 
श्लोक  9.5.29-30 
जितानि परराष्ट्राणि स्वराष्ट्रमनुपालितम्॥ २९॥
भुक्ताश्च विविधा भोगास्त्रिवर्ग: सेवितो मया।
पितॄणां गतमानृण्यं क्षत्रधर्मस्य चोभयो:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
‘मैंने अन्य राज्योंको जीता, निरन्तर अपने राष्ट्रका पालन किया, नाना प्रकारके सुखोंका उपभोग किया, धर्म, अर्थ और काममें रत रहा तथा पितरोंका तथा क्षत्रियधर्मका ऋण चुकाया ॥ 29-30॥
 
‘I conquered other kingdoms, constantly looked after my nation, enjoyed various kinds of pleasures, indulged in Dharma, Artha and Kama and repaid the debt of both the ancestors and the Kshatriya Dharma.॥ 29-30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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