Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 9.5.25-26h: आपने सबके हित के लिए स्नेहपूर्वक कहा है। मैं आपकी बात में कोई दोष नहीं देखता, न ही उसकी आलोचना करता हूँ। मैं तो केवल इतना कह रहा हूँ कि अब किसी भी प्रकार की शांति की कोई संभावना नहीं है। ऐसा मेरा विश्वास है।॥25 1/2॥ | mahabharat अध्याय 9.5: दुर्योधनका कृपाचार्यको उत्तर देते हुए सन्धि स्वीकार न करके युद्धका ही निश्चय करना । mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
नाभ्यसूयामि ते वाक्यमुक्तं स्निग्धं हितं त्वया॥ २५॥
न तु सन्धिमहं मन्ये प्राप्तकालं कथञ्चन।
अनुवाद
आपने सबके हित के लिए स्नेहपूर्वक कहा है। मैं आपकी बात में कोई दोष नहीं देखता, न ही उसकी आलोचना करता हूँ। मैं तो केवल इतना कह रहा हूँ कि अब किसी भी प्रकार की शांति की कोई संभावना नहीं है। ऐसा मेरा विश्वास है।॥25 1/2॥
‘You have spoken out of affection for the benefit of all. I do not find fault with what you have said, nor do I criticize it. I am only saying that now there is no chance of any kind of peace. This is my belief.॥ 25 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥