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mahabharat 9.5.20-21: ‘द्रौपदी अपने पतियों की अभीष्ट कामनाओं की पूर्ति के लिए अत्यन्त कठोर तप करती है और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण की सगी बहिन सुभद्रा अपना अभिमान और अहंकार त्यागकर दासी की भाँति सदैव द्रौपदी की सेवा करती है।’ इस प्रकार इन सब कर्मों के रूप में वैर की अग्नि प्रज्वलित हो गई है, जो किसी भी प्रकार से बुझने वाली नहीं है।   |   mahabharat अध्याय 9.5: दुर्योधनका कृपाचार्यको उत्तर देते हुए सन्धि स्वीकार न करके युद्धका ही निश्चय करना   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 5: दुर्योधनका कृपाचार्यको उत्तर देते हुए सन्धि स्वीकार न करके युद्धका ही निश्चय करना  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  9.5.20-21 
उग्रं तेपे तप: कृष्णा भर्तॄणामर्थसिद्धये।
निक्षिप्य मानं दर्पं च वासुदेवसहोदरा॥ २०॥
कृष्णाया: प्रेष्यवद् भूत्वा शुश्रूषां कुरुते सदा।
इति सर्वं समुन्नद्धं न निर्वाति कथञ्चन॥ २१॥
 
 
अनुवाद
‘द्रौपदी अपने पतियों की अभीष्ट कामनाओं की पूर्ति के लिए अत्यन्त कठोर तप करती है और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण की सगी बहिन सुभद्रा अपना अभिमान और अहंकार त्यागकर दासी की भाँति सदैव द्रौपदी की सेवा करती है।’ इस प्रकार इन सब कर्मों के रूप में वैर की अग्नि प्रज्वलित हो गई है, जो किसी भी प्रकार से बुझने वाली नहीं है।
 
‘Draupadi performs very severe penance for the fulfillment of the desired wishes of her husbands and Subhadra, the real sister of Vasudevanandan Sri Krishna, throwing away her pride and arrogance, always serves Draupadi like a maid. In this way, the fire of enmity has been ignited in the form of all these actions, which cannot be extinguished by any means.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)