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श्लोक 9.5.18-19  |
न निवारयितुं शक्या: संग्रामात्ते परंतपा:॥ १८॥
यदा च द्रौपदी क्लिष्टा मद्विनाशाय दु:खिता।
स्थण्डिले नित्यदा शेते यावद् वैरस्य यातनम्॥ १९॥ |
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| अनुवाद |
| इसीलिए अब उन शत्रुओं को सताने वाले वीरों को युद्ध करने से रोका नहीं जा सकता। जब से द्रौपदी का चीरहरण हुआ है, तब से वह दुःखी होकर प्रतिदिन मिट्टी की वेदी पर सोती रहती है और मुझे नष्ट करने की प्रतिज्ञा करती है। उसने यह प्रतिज्ञा तब तक की है जब तक कि शत्रुता का पूर्णतया प्रतिशोध न हो जाए।॥18-19॥ |
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| ‘That is why now those enemy-tormenting heroes cannot be stopped from fighting. Ever since Draupadi was tortured, she has been saddened and has been sleeping on a mud altar every day, vowing to destroy me. She has taken this vow until the enmity is completely avenged.॥ 18-19॥ |
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