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mahabharat 9.5.1: संजय कहते हैं - हे प्रजानाथ! तपस्वी कृपाचार्य के ऐसा कहने पर दुर्योधन कुछ देर तक चुपचाप बैठा रहा, भारी और गर्म साँसें लेता रहा।   |   mahabharat अध्याय 9.5: दुर्योधनका कृपाचार्यको उत्तर देते हुए सन्धि स्वीकार न करके युद्धका ही निश्चय करना   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 5: दुर्योधनका कृपाचार्यको उत्तर देते हुए सन्धि स्वीकार न करके युद्धका ही निश्चय करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  9.5.1 
संजय उवाच
एवमुक्तस्ततो राजा गौतमेन तपस्विना।
नि:श्वस्य दीर्घमुष्णं च तूष्णीमासीद् विशाम्पते॥ १॥
 
 
अनुवाद
संजय कहते हैं - हे प्रजानाथ! तपस्वी कृपाचार्य के ऐसा कहने पर दुर्योधन कुछ देर तक चुपचाप बैठा रहा, भारी और गर्म साँसें लेता रहा।
 
Sanjaya says - O Prajanath! When the ascetic Kripacharya said this, Duryodhan sat quietly for some time, breathing heavily and hotly. 1.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)