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श्लोक  9.48.7 
सा तं दृष्ट्वोग्रतपसं वसिष्ठं तपतां वरम्।
आचारैर्मुनिभिर्दृष्टै: पूजयामास भारत॥ ७॥
 
 
अनुवाद
हे भरतपुत्र! तपस्वियों में श्रेष्ठ और घोर तपस्या में तत्पर वसिष्ठ को देखकर उन्होंने मुनि के योग्य विधिपूर्वक उनकी पूजा की।
 
O son of Bharata! Seeing Vasishtha, the best of the ascetics and devoted to intense penance, he worshipped him in the manner befitting a sage.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)