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श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 48: बदरपाचनतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें श्रुतावती और अरुन्धतीके तपकी कथा  »  श्लोक 42-43
 
 
श्लोक  9.48.42-43 
दिव्या मनोरमा: पुण्या: कथा: शुश्राव सा तदा।
अतीता सा त्वनावृष्टिर्घोरा द्वादशवार्षिकी॥ ४२॥
अनश्नन्त्या: पचन्त्याश्च शृण्वन्त्याश्च कथा: शुभा:।
दिनोपम: स तस्याथ कालोऽतीत: सुदारुण:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
उस समय उसे अत्यंत पवित्र, सुंदर और दिव्य कथाएँ सुनने को मिलीं। वह बिना खाए बेर पकाती रही और मंगलमय कथाएँ सुनती रही। इसी बीच बारह वर्षों का भयंकर अकाल समाप्त हो गया। वह अत्यंत कठिन समय उसके लिए एक दिन के समान बीत गया।
 
‘At that time, she started hearing very pure, beautiful and divine stories. She kept on cooking berries without eating and kept on listening to auspicious stories. In the meantime, the terrible drought of twelve years ended. That very difficult time passed like a day for her.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)