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श्लोक  9.48.24 
चरणौ दह्यमानौ च नाचिन्तयदनिन्दिता।
कुर्वाणा दुष्करं कर्म महर्षिप्रियकाम्यया॥ २४॥
 
 
अनुवाद
उस भिक्षुणी को अपने जलते हुए पैरों की ज़रा भी परवाह नहीं थी। वह महर्षि को प्रसन्न करने की इच्छा से यह कठिन कार्य कर रही थी।
 
That nun did not care at all about her burning feet. She was performing the difficult task with the desire to please the Maharshika.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)