श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 47: वरुणका अभिषेक तथा अग्नितीर्थ, ब्रह्मयोनि और कुबेरतीर्थकी उत्पत्तिका प्रसंग  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  9.47.27-28 
ददृशे तत्र तत् स्थानं कौबेरे काननोत्तमे॥ २७॥
पुरा यत्र तपस्तप्तं विपुलं सुमहात्मना।
यक्षराज्ञा कुबेरेण वरा लब्धाश्च पुष्कला:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् वे एक अद्भुत वन में कुबेर के स्थान पर गए जहाँ पूर्वकाल में महान यक्षराज कुबेर ने घोर तपस्या करके अनेक वरदान प्राप्त किए थे॥ 27-28॥
 
Thereafter he visited the place of Kubera in a wonderful forest where in the past the great Yaksharaj Kubera had performed severe penance and received many boons.॥ 27-28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)