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mahabharat 9.44.7-8: उस वीर्य के कारण भगवान अग्निदेव तेजस्वी, तेजस्वी और शक्तिशाली होते हुए भी पीड़ा अनुभव करने लगे। जब वे उस तेजस्वी गर्भ को धारण करने में असमर्थ हो गए, तब ब्रह्माजी की आज्ञा से भगवान अग्निदेव ने सूर्य के समान तेजस्वी उस दिव्य गर्भ को गंगा में फेंक दिया।   |   mahabharat अध्याय 9.44: कुमार कार्तिकेयका प्राकट्य और उनके अभिषेककी तैयारी   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 44: कुमार कार्तिकेयका प्राकट्य और उनके अभिषेककी तैयारी  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  9.44.7-8 
तेनासीदतितेजस्वी दीप्तिमान् हव्यवाहन:।
न चैव धारयामास गर्भं तेजोमयं तदा॥ ७॥
स गङ्गामभिसंगम्य नियोगाद् ब्रह्मण: प्रभु:।
गर्भमाहितवान् दिव्यं भास्करोपमतेजसम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
उस वीर्य के कारण भगवान अग्निदेव तेजस्वी, तेजस्वी और शक्तिशाली होते हुए भी पीड़ा अनुभव करने लगे। जब वे उस तेजस्वी गर्भ को धारण करने में असमर्थ हो गए, तब ब्रह्माजी की आज्ञा से भगवान अग्निदेव ने सूर्य के समान तेजस्वी उस दिव्य गर्भ को गंगा में फेंक दिया।
 
Due to that semen, Lord Agni, despite being bright, radiant and powerful, started experiencing pain. When he was unable to carry that radiant foetus, then on Brahmaji's orders, Lord Agni threw that divine foetus, as radiant as the Sun, into the Ganges.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)