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mahabharat 9.44.18: वह तेजस्वी बालक उस दिव्य सुवर्णमय प्रदेश में सरकण्डों के समूह पर स्थित होकर गन्धर्वों और ऋषियों के मुख से अपनी स्तुति सुनता हुआ निरन्तर सो रहा था।   |   mahabharat अध्याय 9.44: कुमार कार्तिकेयका प्राकट्य और उनके अभिषेककी तैयारी   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 44: कुमार कार्तिकेयका प्राकट्य और उनके अभिषेककी तैयारी  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  9.44.18 
स तस्मिन् काञ्चने दिव्ये शरस्तम्बे श्रिया वृत:।
स्तूयमान: सदा शेते गन्धर्वैर्मुनिभिस्तथा॥ १८॥
 
 
अनुवाद
वह तेजस्वी बालक उस दिव्य सुवर्णमय प्रदेश में सरकण्डों के समूह पर स्थित होकर गन्धर्वों और ऋषियों के मुख से अपनी स्तुति सुनता हुआ निरन्तर सो रहा था।
 
That radiant child, situated on a group of reeds in that divine golden region, was sleeping continuously, listening to his praises from the mouths of Gandharvas and sages.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)