श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 44: कुमार कार्तिकेयका प्राकट्य और उनके अभिषेककी तैयारी  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  9.44.1 
जनमेजय उवाच
सरस्वत्या: प्रभावोऽयमुक्तस्ते द्विजसत्तम।
कुमारस्याभिषेकं तु ब्रह्मन् व्याख्यातुमर्हसि॥ १॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय ने कहा - द्विजश्रेष्ठ! आपने सरस्वतीका यह प्रभाव बताया है। ब्रह्मन्! अब कुमार कार्तिकेय के अभिषेक का वर्णन कीजिए। 1॥
 
Janamejaya said – Dwijashreshtha! You have mentioned this effect of Saraswatika. Brahman! Now describe the consecration of Kumar Kartikeya. 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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