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mahabharat 9.43.47: जहाँ प्राचीन काल में राजा धीरज सोम ने विधिपूर्वक राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया था। उस महान यज्ञ में बुद्धिमान एवं साहसी महात्मा अत्रिणि होता ने कार्य सम्पन्न किया था।   |   mahabharat अध्याय 9.43: ऋषियोंके प्रयत्नसे सरस्वतीके शापकी निवृत्ति, जलकी शुद्धि तथा अरुणासंगममें स्नान करनेसे राक्षसों और इन्द्रका संकटमोचन   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 43: ऋषियोंके प्रयत्नसे सरस्वतीके शापकी निवृत्ति, जलकी शुद्धि तथा अरुणासंगममें स्नान करनेसे राक्षसों और इन्द्रका संकटमोचन  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  9.43.47 
यत्रायजद् राजसूयेन सोम:
साक्षात् पुरा विधिवत् पार्थिवेन्द्र:।
अत्रिर्धीमान् विप्रमुख्यो बभूव
होता यस्मिन् क्रतुमुख्ये महात्मा॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
जहाँ प्राचीन काल में राजा धीरज सोम ने विधिपूर्वक राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया था। उस महान यज्ञ में बुद्धिमान एवं साहसी महात्मा अत्रिणि होता ने कार्य सम्पन्न किया था।
 
Where in ancient times, King Dhiraj Som had performed the ritual of Rajasuya Yagya ritually. In that great yagya, the intelligent and courageous Mahatma Atrini Hota had performed the task.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)