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mahabharat 9.43.32-33h: जनमेजय ने पूछा - ब्रह्मन् ! भगवान इन्द्र को ब्रह्महत्या का पाप कैसे लगा और इस तीर्थ में स्नान करने से वे किस प्रकार पाप से मुक्त हुए ? 32 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 9.43: ऋषियोंके प्रयत्नसे सरस्वतीके शापकी निवृत्ति, जलकी शुद्धि तथा अरुणासंगममें स्नान करनेसे राक्षसों और इन्द्रका संकटमोचन   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 43: ऋषियोंके प्रयत्नसे सरस्वतीके शापकी निवृत्ति, जलकी शुद्धि तथा अरुणासंगममें स्नान करनेसे राक्षसों और इन्द्रका संकटमोचन  »  श्लोक 32-33h
 
 
श्लोक  9.43.32-33h 
जनमेजय उवाच
किमर्थं भगवान् शक्रो ब्रह्मवध्यामवाप्तवान्॥ ३२॥
कथमस्मिंश्च तीर्थे वै आप्लुत्याकल्मषोऽभवत्।
 
 
अनुवाद
जनमेजय ने पूछा - ब्रह्मन् ! भगवान इन्द्र को ब्रह्महत्या का पाप कैसे लगा और इस तीर्थ में स्नान करने से वे किस प्रकार पाप से मुक्त हुए ? 32 1/2॥
 
Janamejaya asked – Brahmin! How did Lord Indra commit the sin of killing a Brahma and how was he freed from his sin by taking bath in this pilgrimage? 32 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)