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mahabharat 9.43.3: उस रक्त से पूर्णतया तृप्त, प्रसन्न और चिंतारहित होकर राक्षस वहाँ नाचने और हँसने लगे, मानो उन्होंने स्वर्ग को जीत लिया हो॥3॥   |   mahabharat अध्याय 9.43: ऋषियोंके प्रयत्नसे सरस्वतीके शापकी निवृत्ति, जलकी शुद्धि तथा अरुणासंगममें स्नान करनेसे राक्षसों और इन्द्रका संकटमोचन   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 43: ऋषियोंके प्रयत्नसे सरस्वतीके शापकी निवृत्ति, जलकी शुद्धि तथा अरुणासंगममें स्नान करनेसे राक्षसों और इन्द्रका संकटमोचन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  9.43.3 
तृप्ताश्च सुभृशं तेन सुखिता विगतज्वरा:।
नृत्यन्तश्च हसन्तश्च यथा स्वर्गजितस्तथा॥ ३॥
 
 
अनुवाद
उस रक्त से पूर्णतया तृप्त, प्रसन्न और चिंतारहित होकर राक्षस वहाँ नाचने और हँसने लगे, मानो उन्होंने स्वर्ग को जीत लिया हो॥3॥
 
Fully satisfied with that blood, happy and free of worries, the demons began dancing and laughing there, as if they had conquered the heaven. ॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)