Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 9.43.20-21h: हम जो पाप करते हैं, वे हमारे अपने नहीं हैं। हमें आप जैसे महात्माओं का आशीर्वाद कभी नहीं मिला और हम सदैव बुरे कर्म ही करते रहे हैं। इसी कारण हमारे पाप बढ़ते ही जा रहे हैं और हम ब्रह्मराक्षस बन गए हैं॥ 20 1/2॥ | mahabharat अध्याय 9.43: ऋषियोंके प्रयत्नसे सरस्वतीके शापकी निवृत्ति, जलकी शुद्धि तथा अरुणासंगममें स्नान करनेसे राक्षसों और इन्द्रका संकटमोचन । mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
न च न: कामकारोऽयं यद् वयं पापकारिण:।
युष्माकं चाप्रसादेन दुष्कृतेन च कर्मणा॥ २०॥
यत् पापं वर्धतेऽस्माकं तत: स्मो ब्रह्मराक्षसा:।
अनुवाद
हम जो पाप करते हैं, वे हमारे अपने नहीं हैं। हमें आप जैसे महात्माओं का आशीर्वाद कभी नहीं मिला और हम सदैव बुरे कर्म ही करते रहे हैं। इसी कारण हमारे पाप बढ़ते ही जा रहे हैं और हम ब्रह्मराक्षस बन गए हैं॥ 20 1/2॥
‘The sins that we commit are not our own doing. We have never received the blessings of great souls like you and we have always committed bad deeds. Due to this our sins keep on increasing and we have become Brahmarakshas.॥ 20 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥