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mahabharat 9.42.5: महाराज! जिस स्थान पर भगवान स्थाणु ने महान तप किया था, वहाँ विद्वान पुरुष उनकी घोर तपस्या का वर्णन करते हैं॥5॥   |   mahabharat अध्याय 9.42: वसिष्ठापवाह तीर्थकी उत्पत्तिके प्रसंगमें विश्वामित्रका क्रोध और वसिष्ठजीकी सहनशीलता   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 42: वसिष्ठापवाह तीर्थकी उत्पत्तिके प्रसंगमें विश्वामित्रका क्रोध और वसिष्ठजीकी सहनशीलता  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  9.42.5 
यत्र स्थाणुर्महाराज तप्तवान् परमं तप:।
तत्रास्य कर्म तद् घोरं प्रवदन्ति मनीषिण:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
महाराज! जिस स्थान पर भगवान स्थाणु ने महान तप किया था, वहाँ विद्वान पुरुष उनकी घोर तपस्या का वर्णन करते हैं॥5॥
 
Maharaj! At the place where Lord Sthānu had performed great penance, wise men describe his severe penance. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)