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mahabharat 9.42.41-42: नरेश्वर ! इस प्रकार वह स्थान संसार में वसिष्ठपवाह के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वसिष्ठजी को बहाकर नदियों में श्रेष्ठ सरस्वती पुनः अपने पूर्व मार्ग पर बहने लगी ॥41-42॥   |   mahabharat अध्याय 9.42: वसिष्ठापवाह तीर्थकी उत्पत्तिके प्रसंगमें विश्वामित्रका क्रोध और वसिष्ठजीकी सहनशीलता   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 42: वसिष्ठापवाह तीर्थकी उत्पत्तिके प्रसंगमें विश्वामित्रका क्रोध और वसिष्ठजीकी सहनशीलता  »  श्लोक 41-42
 
 
श्लोक  9.42.41-42 
एवं वसिष्ठापवाहो लोके ख्यातो जनाधिप॥ ४१॥
आगच्छच्च पुनर्मार्गं स्वमेव सरितां वरा॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
नरेश्वर ! इस प्रकार वह स्थान संसार में वसिष्ठपवाह के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वसिष्ठजी को बहाकर नदियों में श्रेष्ठ सरस्वती पुनः अपने पूर्व मार्ग पर बहने लगी ॥41-42॥
 
Nareshwar! In this way that place became famous in the world by the name of Vasisthapavaha. After shedding Vashishthaji, Saraswati, the best of rivers, again started flowing on her previous path. 41-42॥
 
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने द्विचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें

सारस्वतोपाख्यानविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४२॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)