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mahabharat 9.42.37-39h: महर्षि वशिष्ठ को पुनः अपने से दूर जाते देख, विश्वामित्र अत्यन्त क्रोधित हो उठे और बोले, "हे शुभ सरस्वती, हे नदियों में श्रेष्ठ! तुम मुझे धोखा देकर पुनः चली गई हो। अतः अब जल के स्थान पर रक्त प्रवाहित करो, जो दैत्यों को अधिक प्रिय है।"   |   mahabharat अध्याय 9.42: वसिष्ठापवाह तीर्थकी उत्पत्तिके प्रसंगमें विश्वामित्रका क्रोध और वसिष्ठजीकी सहनशीलता   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 42: वसिष्ठापवाह तीर्थकी उत्पत्तिके प्रसंगमें विश्वामित्रका क्रोध और वसिष्ठजीकी सहनशीलता  »  श्लोक 37-39h
 
 
श्लोक  9.42.37-39h 
ततोऽपवाहितं दृष्ट्वा वसिष्ठमृषिसत्तमम्॥ ३७॥
अब्रवीद् दु:खसंक्रुद्धो विश्वामित्रो ह्यमर्षण:।
यस्मान्मां त्वं सरिच्छ्रेष्ठे वञ्चयित्वा पुनर्गता॥ ३८॥
शोणितं वह कल्याणि रक्षोग्रामणिसम्मतम्।
 
 
अनुवाद
महर्षि वशिष्ठ को पुनः अपने से दूर जाते देख, विश्वामित्र अत्यन्त क्रोधित हो उठे और बोले, "हे शुभ सरस्वती, हे नदियों में श्रेष्ठ! तुम मुझे धोखा देकर पुनः चली गई हो। अतः अब जल के स्थान पर रक्त प्रवाहित करो, जो दैत्यों को अधिक प्रिय है।"
 
Seeing the great sage Vasishtha being driven away from him once again, the infuriated Visvamitra became extremely angry and said, 'O auspicious Sarasvati, the best of the rivers, you have deceived me and gone away again. So, now instead of water, pour blood, which is more dear to the demons.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)