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mahabharat 9.42.29: मित्रावरुण के पुत्र वशिष्ठजी भी उस प्रवाहित तट पर बहने लगे। राजन! बहते-बहते वशिष्ठजी सरस्वती की स्तुति करने लगे-॥ 29॥   |   mahabharat अध्याय 9.42: वसिष्ठापवाह तीर्थकी उत्पत्तिके प्रसंगमें विश्वामित्रका क्रोध और वसिष्ठजीकी सहनशीलता   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  9.42.29 
तेन कूलापहारेण मैत्रावरुणिरौह्यत।
उह्यमान: स तुष्टाव तदा राजन् सरस्वतीम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
मित्रावरुण के पुत्र वशिष्ठजी भी उस प्रवाहित तट पर बहने लगे। राजन! बहते-बहते वशिष्ठजी सरस्वती की स्तुति करने लगे-॥ 29॥
 
Mitravarun's son Vashishthaji also started flowing along that flowing bank. Rajan! While flowing, Vashishthaji started praising Saraswati -॥ 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)