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mahabharat 9.42.27-28: तत्पश्चात्, महर्षि विश्वामित्र को अपने तट पर जप और हवन करते देख, नदियों में श्रेष्ठ सरस्वती ने सोचा कि यह अच्छा अवसर है। तब नदी ने पूर्वी तट को तोड़कर अपने वेग से उसे बहाकर ले जाना आरम्भ कर दिया।   |   mahabharat अध्याय 9.42: वसिष्ठापवाह तीर्थकी उत्पत्तिके प्रसंगमें विश्वामित्रका क्रोध और वसिष्ठजीकी सहनशीलता   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 42: वसिष्ठापवाह तीर्थकी उत्पत्तिके प्रसंगमें विश्वामित्रका क्रोध और वसिष्ठजीकी सहनशीलता  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  9.42.27-28 
अथ कूले स्वके राजन् जपन्तमृषिसत्तमम्।
जुह्वानं कौशिकं प्रेक्ष्य सरस्वत्यभ्यचिन्तयत् ॥ २७॥
इदमन्तरमित्येवं तत: सा सरितां वरा।
कूलापहारमकरोत् स्वेन वेगेन सा सरित्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात्, महर्षि विश्वामित्र को अपने तट पर जप और हवन करते देख, नदियों में श्रेष्ठ सरस्वती ने सोचा कि यह अच्छा अवसर है। तब नदी ने पूर्वी तट को तोड़कर अपने वेग से उसे बहाकर ले जाना आरम्भ कर दिया।
 
King! Thereafter, seeing the great sage Vishwamitra chanting and performing havans on its banks, Saraswati, the best of the rivers, thought that this was a good opportunity. Then the river broke the eastern bank and started carrying it away with its force.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)