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mahabharat 9.42.1-2: जनमेजय ने पूछा— हे प्रभु! वशिष्ठपव तीर्थ में सरस्वती का जल इतना वेगवान कैसे हो गया? समस्त नदियों में श्रेष्ठ सरस्वती ने उन ऋषियों को क्यों डुबो दिया? उनसे उसका वैर कैसे हो गया? उस वैर का कारण क्या है? हे महामुनि! कृपया मुझे वह बताइए जो मैंने पूछा है। आपकी बातें सुनकर मुझे संतोष नहीं हो रहा है।   |   mahabharat अध्याय 9.42: वसिष्ठापवाह तीर्थकी उत्पत्तिके प्रसंगमें विश्वामित्रका क्रोध और वसिष्ठजीकी सहनशीलता   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 42: वसिष्ठापवाह तीर्थकी उत्पत्तिके प्रसंगमें विश्वामित्रका क्रोध और वसिष्ठजीकी सहनशीलता  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  9.42.1-2 
जनमेजय उवाच
वसिष्ठस्यापवाहोऽसौ भीमवेग: कथं नु स:।
किमर्थं च सरिच्छ्रेष्ठा तमृषिं प्रत्यवाहयत्॥ १॥
कथमस्याभवद् वैरं कारणं किं च तत् प्रभो।
शंस पृष्टो महाप्राज्ञ न हि तृप्यामि ते वच:॥ २॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय ने पूछा— हे प्रभु! वशिष्ठपव तीर्थ में सरस्वती का जल इतना वेगवान कैसे हो गया? समस्त नदियों में श्रेष्ठ सरस्वती ने उन ऋषियों को क्यों डुबो दिया? उनसे उसका वैर कैसे हो गया? उस वैर का कारण क्या है? हे महामुनि! कृपया मुझे वह बताइए जो मैंने पूछा है। आपकी बातें सुनकर मुझे संतोष नहीं हो रहा है।
 
Janamejaya asked— Lord! How did the water of Saraswati become so fast in Vasishthapava Tirtha? Why did Saraswati, the best of all rivers, drown those sages? How did she develop enmity with them? What is the reason for that enmity? O great sage! Please tell me what I have asked. I am not satisfied listening to your words.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)