| श्री महाभारत » पर्व 9: शल्य पर्व » अध्याय 41: अवाकीर्ण और यायात तीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दाल्भ्यकी कथा और ययातिके यज्ञका वर्णन » श्लोक 40 |
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| | | | श्लोक 9.41.40  | ततस्तालकेतुर्महाधर्मकेतु-
र्महात्मा कृतात्मा महादाननित्य:।
वसिष्ठापवाहं महाभीमवेगं
धृतात्मा जितात्मा समभ्याजगाम॥ ४०॥ | | | | | | अनुवाद | | तदनन्तर महात्मा कृतात्मा, धृतात्मा और जितात्मा बलरामजी, जिनकी ध्वजा महान धर्म है और जिनकी पताका ताड़का चिन्ह से सुशोभित है, जो प्रतिदिन बड़े-बड़े दान करते थे, वहाँ से वसिष्ठपाव नामक तीर्थ में गए, जहाँ सरस्वती का वेग अत्यन्त भयंकर है ॥40॥ | | | | Thereafter, Mahatma, Kritatma, Dhritatma and Jitatma Balramji, whose flag is the great religion and whose ensign is adorned with Tadaka symbol, who used to make big donations every day, went from there to a pilgrimage named Vasisthapavah, where the speed of Saraswati is very fierce. 40॥ | | | इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने एकचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें
सारस्वतोपाख्यानविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४१॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४० १/२ श्लोक हैं।) | | | | ✨ ai-generated | | |
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