श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 41: अवाकीर्ण और यायात तीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दाल्भ्यकी कथा और ययातिके यज्ञका वर्णन  »  श्लोक 31-32
 
 
श्लोक  9.41.31-32 
तत्रापि विधिवद् दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यो महायशा:।
वाजिन: कुञ्जरांश्चैव रथांश्चाश्वतरीयुतान्॥ ३१॥
रत्नानि च महार्हाणि धनं धान्यं च पुष्कलम्।
ययौ तीर्थं महाबाहुर्यायातं पृथिवीपते॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! उस तीर्थ में भी महाप्रतापी महाबाहु बलरामजी ने ब्राह्मणों को हाथी, घोड़े, खच्चरों से जुते हुए रथ, बहुमूल्य रत्न तथा प्रचुर धन-धान्य दान किया और वहाँ से यायात तीर्थ को चले गए ॥31-32॥
 
Prithvinath! In that pilgrimage also, the great-illustrious Mahabahu Balramji donated elephants, horses, chariots harnessed by mules, precious gems and abundant wealth and grains to the Brahmins and from there proceeded to Yayat pilgrimage. 31-32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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