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mahabharat 9.41.29-30: महाराज! उसी तीर्थ में उदारचित्त बृहस्पतिजी ने दैत्यों के नाश और देवताओं की उन्नति के लिए मांस द्वारा यज्ञ का अनुष्ठान किया था। इससे वे दैत्य दुर्बल हो गए और युद्ध में विजय से विभूषित देवताओं ने उनका संहार कर दिया। 29-30॥   |   mahabharat अध्याय 9.41: अवाकीर्ण और यायात तीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दाल्भ्यकी कथा और ययातिके यज्ञका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 41: अवाकीर्ण और यायात तीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दाल्भ्यकी कथा और ययातिके यज्ञका वर्णन  »  श्लोक 29-30
 
 
श्लोक  9.41.29-30 
तत्र तीर्थे महाराज बृहस्पतिरुदारधी:।
असुराणामभावाय भवाय च दिवौकसाम्॥ २९॥
मांसैरभिजुहावेष्टिमक्षीयन्त ततोऽसुरा:।
दैवतैरपि सम्भग्ना जितकाशिभिराहवे॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
महाराज! उसी तीर्थ में उदारचित्त बृहस्पतिजी ने दैत्यों के नाश और देवताओं की उन्नति के लिए मांस द्वारा यज्ञ का अनुष्ठान किया था। इससे वे दैत्य दुर्बल हो गए और युद्ध में विजय से विभूषित देवताओं ने उनका संहार कर दिया। 29-30॥
 
Maharaj! In the same pilgrimage, the generous mind Brihaspati ji had performed the ritual of ritual sacrifice through meat for the destruction of the demons and the progress of the gods. Due to this, those demons became weak and the gods, who were decorated with victory in the war, killed them. 29-30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)