श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 41: अवाकीर्ण और यायात तीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दाल्भ्यकी कथा और ययातिके यज्ञका वर्णन  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  9.41.23-24 
निपत्य शिरसा भूमौ प्राञ्जलिर्भरतर्षभ।
प्रसादये त्वां भगवन्नपराधं क्षमस्व मे॥ २३॥
मम दीनस्य लुब्धस्य मौर्ख्येण हतचेतस:।
त्वं गतिस्त्वं च मे नाथ: प्रसादं कर्तुमर्हसि॥ २४॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! उसने पृथ्वी पर सिर झुकाकर हाथ जोड़कर कहा, 'प्रभु! मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। मुझ दरिद्र, लोभी और मूर्खता के कारण मतिभ्रमित अपराधी के अपराध को क्षमा कर दीजिए। आप ही मेरे मोक्षदाता हैं। आप ही मेरे रक्षक हैं। मुझ पर कृपा कीजिए।'॥ 23-24॥
 
O best of the Bharatas! He bowed his head on the earth and said with folded hands, 'Lord! I want to please you. Please forgive the crime of me, who is poor, greedy and a criminal who has lost his mind due to stupidity. You are my salvation. You are my protector. Please be kind to me.'॥ 23-24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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