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mahabharat 9.41.15-16h: हे प्रभु! जैसे कोई विशाल वन कुल्हाड़ी से काटा जा रहा हो, उसी प्रकार उस राजा का राज्य क्षीण हो रहा था और वह महान विपत्ति में फँस गया था। वह संकट में पड़कर मूर्च्छित हो गया था। ॥15 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 9.41: अवाकीर्ण और यायात तीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दाल्भ्यकी कथा और ययातिके यज्ञका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 41: अवाकीर्ण और यायात तीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दाल्भ्यकी कथा और ययातिके यज्ञका वर्णन  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  9.41.15-16h 
तत: प्रक्षीयमाणं तद् राज्यं तस्य महीपते:।
छिद्यमानं यथानन्तं वनं परशुना विभो॥ १५॥
बभूवापद्‍गतं तच्च व्यवकीर्णमचेतनम्।
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! जैसे कोई विशाल वन कुल्हाड़ी से काटा जा रहा हो, उसी प्रकार उस राजा का राज्य क्षीण हो रहा था और वह महान विपत्ति में फँस गया था। वह संकट में पड़कर मूर्च्छित हो गया था। ॥15 1/2॥
 
O Lord! Just as a huge forest is being cut down with an axe, in the same way that king's kingdom was waning and was trapped in a great calamity. He was in trouble and lost consciousness. ॥15 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)