श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 41: अवाकीर्ण और यायात तीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दाल्भ्यकी कथा और ययातिके यज्ञका वर्णन  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  9.41.12-13 
अवाकीर्णे सरस्वत्यास्तीर्थे प्रज्वाल्य पावकम्॥ १२॥
बको दाल्भ्यो महाराज नियमं परमं स्थित:।
स तैरेव जुहावास्य राष्ट्रं मांसैर्महातपा:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
महाराज! सरस्वती के अवाकीर्णतीर्थ में अग्नि प्रज्वलित करके दल्भपुत्र महातपस्वी बक ने उत्तम नियमों का पालन करते हुए उन मृत पशुओं के मांस से अपने राष्ट्र के लिए हवन करना आरम्भ किया ॥12-13॥
 
Maharaj! After lighting the fire at the Avakirnathirtha of Saraswati, the great ascetic Bak, son of Dalbha, following the excellent rules, started performing the havans for his nation by using the meat of those dead animals. ॥12-13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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