श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 41: अवाकीर्ण और यायात तीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दाल्भ्यकी कथा और ययातिके यज्ञका वर्णन  »  श्लोक 1-3h
 
 
श्लोक  9.41.1-3h 
वैशम्पायन उवाच
ब्रह्मयोनेरवाकीर्णं जगाम यदुनन्दन:।
यत्र दाल्भ्यो बको राजन्नाश्रमस्थो महातपा:॥ १॥
जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं वैचित्रवीर्यिण:।
तपसा घोररूपेण कर्षयन् देहमात्मन:॥ २॥
क्रोधेन महताऽऽविष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान्।
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! यदुनन्दन बलरामजी ब्राह्मणत्व की प्राप्ति कराने वाले तीर्थस्थान को त्यागकर 'अवाकीर्ण' तीर्थस्थान पर गए, जहाँ आश्रम में रहते हुए महान तपस्वी एवं तेजस्वी दल्भपुत्र बकने ने घोर तपस्या द्वारा अपने शरीर को सुखाकर, अत्यंत क्रोध में आकर विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्र के राष्ट्र के लिए अपने प्राण त्याग दिए। 1-2 1/2॥
 
Vaishampayanji says- Rajan! Yadunandan Balramji, after leaving the place of pilgrimage which led to the attainment of Brahminhood, went to the place of pilgrimage of 'Avakirna', where while living in the ashram, the great ascetic and illustrious son of Dalbha, Bakne, in great anger, after drying his body through severe penance, sacrificed himself for the nation of the Vichitravirya Kumar King Dhritarashtra. 1-2 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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