श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 40: आर्ष्टिषेण एवं विश्वामित्रकी तपस्या तथा वरप्राप्ति  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  9.40.7-8 
अस्मिंस्तीर्थे महानद्या अद्यप्रभृति मानव:।
आप्लुतो वाजिमेधस्य फलं प्राप्स्यति पुष्कलम्॥ ७॥
अद्यप्रभृति नैवात्र भयं व्यालाद् भविष्यति।
अपि चाल्पेन कालेन फलं प्राप्स्यति पुष्कलम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
‘आज से जो कोई महान सरस्वती नदी के इस तीर्थ में स्नान करेगा, उसे अश्वमेध यज्ञ का पूर्ण फल मिलेगा। आज से इस तीर्थ में किसी को भी सर्पों का भय नहीं रहेगा। इस तीर्थ में थोड़े समय के लिए भी दर्शन करने से मनुष्य को अपार लाभ प्राप्त होगा।’॥7-8॥
 
‘From today onwards, whoever takes bath in this tirtha of the great river Saraswati will get the full benefits of performing Ashwamedha Yagya. From today onwards, no one will be afraid of snakes in this tirtha. By visiting this tirtha even for a short time, a person will get immense benefits.’॥ 7-8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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