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mahabharat 9.40.4: प्रजानाथ! हे मनुष्यों के स्वामी! गुरुकुल में सदैव रहने पर भी न तो उनकी विद्या समाप्त हुई और न ही वे सम्पूर्ण वेद पढ़ सके॥4॥   |   mahabharat अध्याय 9.40: आर्ष्टिषेण एवं विश्वामित्रकी तपस्या तथा वरप्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 40: आर्ष्टिषेण एवं विश्वामित्रकी तपस्या तथा वरप्राप्ति  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  9.40.4 
तस्य राजन् गुरुकुले वसतो नित्यमेव च।
समाप्तिं नागमद् विद्या नापि वेदा विशाम्पते॥ ४॥
 
 
अनुवाद
प्रजानाथ! हे मनुष्यों के स्वामी! गुरुकुल में सदैव रहने पर भी न तो उनकी विद्या समाप्त हुई और न ही वे सम्पूर्ण वेद पढ़ सके॥4॥
 
Prajanath! O lord of men! Despite staying in the Gurukul all the time, neither did his learning end nor could he read the entire Vedas. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)