श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 40: आर्ष्टिषेण एवं विश्वामित्रकी तपस्या तथा वरप्राप्ति  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  9.40.3 
वैशम्पायन उवाच
पुरा कृतयुगे राजन्नार्ष्टिषेणो द्विजोत्तम:।
वसन् गुरुकुले नित्यं नित्यमध्ययने रत:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी बोले - राजन ! प्राचीन काल के सत्ययुग की कथा है, द्विजश्रेष्ठ अष्टीषेण सदैव गुरुकुल में निवास करते थे और निरन्तर वेद-शास्त्रों के अध्ययन में लगे रहते थे ॥3॥
 
Vaishampayanji said – King! It is a story of Satyayuga of ancient times, Dwijashrestha Ashtishen always resided in Gurukul and was continuously engaged in the study of Vedas and scriptures. 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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