vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 9: शल्य पर्व
»
अध्याय 40: आर्ष्टिषेण एवं विश्वामित्रकी तपस्या तथा वरप्राप्ति
»
श्लोक 27-28h
श्लोक
9.40.27-28h
तपसा तु तथा युक्तं विश्वामित्रं पितामह:॥ २७॥
अमन्यत महातेजा वरदो वरमस्य तत्।
अनुवाद
विश्वामित्र को इस प्रकार तपस्या में लगे देखकर महान एवं वरदाता ब्रह्माजी ने उन्हें वर देने का विचार किया ॥27 1/2॥
Seeing Vishwamitra engaged in such penance, Brahmaji, the great and boon-giving one, thought of granting him a boon. 27 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×