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mahabharat 9.40.13-14: तात! लोग कहते हैं कि कुशिकवंशी राजा गाधि महायोगी और महान तपस्वी थे। उन्होंने अपने पुत्र विश्वामित्र को राज्याभिषेक करके शरीर त्यागने का विचार किया। तब समस्त प्रजा ने उन्हें प्रणाम करके कहा - 'महाज्ञानी राजन! आप कहीं न जाएँ, यहीं रहकर इस संसार के महान भय से हमारी रक्षा करते रहें।' 13-14॥   |   mahabharat अध्याय 9.40: आर्ष्टिषेण एवं विश्वामित्रकी तपस्या तथा वरप्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 40: आर्ष्टिषेण एवं विश्वामित्रकी तपस्या तथा वरप्राप्ति  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  9.40.13-14 
स राजा कौशिकस्तात महायोग्यभवत् किल।
स पुत्रमभिषिच्याथ विश्वामित्रं महातपा:॥ १३॥
देहन्यासे मनश्चक्रे तमूचु: प्रणता: प्रजा:।
न गन्तव्यं महाप्राज्ञ त्राहि चास्मान् महाभयात्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
तात! लोग कहते हैं कि कुशिकवंशी राजा गाधि महायोगी और महान तपस्वी थे। उन्होंने अपने पुत्र विश्वामित्र को राज्याभिषेक करके शरीर त्यागने का विचार किया। तब समस्त प्रजा ने उन्हें प्रणाम करके कहा - 'महाज्ञानी राजन! आप कहीं न जाएँ, यहीं रहकर इस संसार के महान भय से हमारी रक्षा करते रहें।' 13-14॥
 
Tat! People say that Kushikvanshi king Gadhi was a great yogi and a great ascetic. He thought of abandoning his body after anointing his son Vishwamitra to the kingdom. Then all the people bowed before him and said - 'Great wise king! You don't go anywhere, stay here and keep protecting us from the great fear of this world. 13-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)