श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 4: कृपाचार्यका दुर्योधनको संधिके लिये समझाना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  9.4.35 
नष्टचन्द्रा यथा रात्रि: सेनेयं हतनायका।
नागभग्नद्रुमा शुष्का नदीवाकुलतां गता॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
जैसे चन्द्रमा के न निकलने पर रात्रि अन्धकारमय प्रतीत होती है, वैसे ही हमारी सेना भी अपने सेनापति के मर जाने से व्याकुल हो रही है। वह उस सूखी नदी के समान व्याकुल है जिसके किनारों को हाथी ने तोड़ दिया हो॥35॥
 
‘Just as the night appears dark when the moon does not rise, similarly our army is becoming destitute due to the death of its commander. It is distraught like a dry river whose banks have been ravaged by an elephant.॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)