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mahabharat 9.39.9-12h: वैशम्पायनजी बोले - नृपश्रेष्ठ! प्राचीन काल की कथा है, जब रघुकुल तिलक महात्मा श्री रामचंद्रजी ने दण्डकारण्य में रहते हुए राक्षसों के संहार का विचार किया, तब उन्होंने जनस्थान में उस दुष्ट राक्षस का सिर तीक्ष्ण धार वाले फरसे से काट डाला। वह कटा हुआ सिर उछलकर उस महान वन में जा पहुँचा और किसी चमत्कार से वन में विचरण कर रहे महोदर मुनि की जंघा पर जा लगा। नरेश्वर! उस समय वह उनकी हड्डी को छेदकर भीतर गहराई में प्रवेश कर गया। 9-11 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 9.39: औशनस एवं कपालमोचनतीर्थकी माहात्म्यकथा तथा रुषंगुके आश्रम पृथूदकतीर्थकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  9.39.9-12h 
वैशम्पायन उवाच
पुरा वै दण्डकारण्ये राघवेण महात्मना॥ ९॥
वसता राजशार्दूल राक्षसान् शमयिष्यता।
जनस्थाने शिरश्छिन्नं राक्षसस्य दुरात्मन:॥ १०॥
क्षुरेण शितधारेण उत्पपात महावने।
महोदरस्य तल्लग्नं जंघायां वै यदृच्छया॥ ११॥
वने विचरतो राजन्नस्थि भित्त्वास्फुरत् तदा।
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी बोले - नृपश्रेष्ठ! प्राचीन काल की कथा है, जब रघुकुल तिलक महात्मा श्री रामचंद्रजी ने दण्डकारण्य में रहते हुए राक्षसों के संहार का विचार किया, तब उन्होंने जनस्थान में उस दुष्ट राक्षस का सिर तीक्ष्ण धार वाले फरसे से काट डाला। वह कटा हुआ सिर उछलकर उस महान वन में जा पहुँचा और किसी चमत्कार से वन में विचरण कर रहे महोदर मुनि की जंघा पर जा लगा। नरेश्वर! उस समय वह उनकी हड्डी को छेदकर भीतर गहराई में प्रवेश कर गया। 9-11 1/2॥
 
Vaishampayanji said – Nripashrestha! It is a story of ancient times, when Raghukul Tilak Mahatma Shri Ramchandraji, while living in Dandakaranya, thought of killing the demons, he cut off the head of that evil demon in Janasthan with a sharp-edged axe. That severed head jumped up in that great forest and by some miracle, it hit the thigh of Mahodar Muni who was wandering in the forest. Nareshwar! At that time he pierced his bone and entered deep inside. 9-11 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)