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mahabharat 9.39.33-34h: जो व्यक्ति सरस्वती नदी के उत्तरी तट पर स्थित पृथुदक तीर्थ में जप करते हुए अपना शरीर त्यागता है, उसे भविष्य में फिर कभी मृत्यु का कष्ट नहीं सहना पड़ता।'   |   mahabharat अध्याय 9.39: औशनस एवं कपालमोचनतीर्थकी माहात्म्यकथा तथा रुषंगुके आश्रम पृथूदकतीर्थकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  9.39.33-34h 
सरस्वत्युत्तरे तीरे यस्त्यजेदात्मनस्तनुम्॥ ३३॥
पृथूदके जप्यपरो नैनं श्वोमरणं तपेत्।
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति सरस्वती नदी के उत्तरी तट पर स्थित पृथुदक तीर्थ में जप करते हुए अपना शरीर त्यागता है, उसे भविष्य में फिर कभी मृत्यु का कष्ट नहीं सहना पड़ता।'
 
He who gives up his body while chanting at the Prithudaka Tirtha on the northern bank of the Saraswati will not have to suffer the pain of death again in the future.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)