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mahabharat 9.39.31-33h: राजन! व्याघ्र! जब वे पुत्र ब्राह्मणों के समूहों से सेवित तथा सैकड़ों तीर्थों से सुशोभित उन बुद्धिमान मुनियों को पुण्यमयी सरस्वती के तट पर ले आए, तब उन महातपस्वी महर्षि ने वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके तीर्थ के पुण्य को जानकर अपने पास बैठे हुए समस्त पुत्रों से प्रसन्नतापूर्वक कहा -   |   mahabharat अध्याय 9.39: औशनस एवं कपालमोचनतीर्थकी माहात्म्यकथा तथा रुषंगुके आश्रम पृथूदकतीर्थकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  9.39.31-33h 
स तै: पुत्रैस्तदा धीमानानीतो वै सरस्वतीम्।
पुण्यां तीर्थशतोपेतां विप्रसङ्घैर्निषेविताम्॥ ३१॥
स तत्र विधिना राजन्नाप्लुत्य सुमहातपा:।
ज्ञात्वा तीर्थगुणांश्चैव प्राहेदमृषिसत्तम:॥ ३२॥
सुप्रीत: पुरुषव्याघ्र सर्वान् पुत्रानुपासत:।
 
 
अनुवाद
राजन! व्याघ्र! जब वे पुत्र ब्राह्मणों के समूहों से सेवित तथा सैकड़ों तीर्थों से सुशोभित उन बुद्धिमान मुनियों को पुण्यमयी सरस्वती के तट पर ले आए, तब उन महातपस्वी महर्षि ने वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके तीर्थ के पुण्य को जानकर अपने पास बैठे हुए समस्त पुत्रों से प्रसन्नतापूर्वक कहा -
 
Rajan! Tiger! When those sons brought those wise monks, served by groups of Brahmins and adorned with hundreds of pilgrimages, to the banks of the virtuous Saraswati, then that great ascetic Maharishi, after taking a ritual bath there, knowing the virtues of the pilgrimage, said happily to all the sons sitting near him -
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)