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mahabharat 9.39.28-29: भरत! वृद्ध ब्राह्मण रुषंगु सदैव तपस्या में लीन रहते थे। एक बार महातपस्वी रुषंगु मुनि ने शरीर त्यागने का विचार किया और बहुत विचार करने के बाद अपने समस्त पुत्रों को बुलाकर उनसे कहा - 'मुझे पृथूदक तीर्थ में ले चलो'॥28-29॥   |   mahabharat अध्याय 9.39: औशनस एवं कपालमोचनतीर्थकी माहात्म्यकथा तथा रुषंगुके आश्रम पृथूदकतीर्थकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  9.39.28-29 
रुषङ्गुर्ब्राह्मणो वृद्धस्तपोनित्यश्च भारत।
देहन्यासे कृतमना विचिन्त्य बहुधा तदा॥ २८॥
तत: सर्वानुपादाय तनयान् वै महातपा:।
रुषङ्गुरब्रवीत् तत्र नयध्वं मां पृथूदकम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
भरत! वृद्ध ब्राह्मण रुषंगु सदैव तपस्या में लीन रहते थे। एक बार महातपस्वी रुषंगु मुनि ने शरीर त्यागने का विचार किया और बहुत विचार करने के बाद अपने समस्त पुत्रों को बुलाकर उनसे कहा - 'मुझे पृथूदक तीर्थ में ले चलो'॥28-29॥
 
Bharat! The old Brahmin Rushangu was always engaged in penance. Once, the great ascetic Rushangu Muni thought of giving up his body and after much thought, called all his sons and said to them, 'Take me to the Prithudak Tirtha'॥28-29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)