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mahabharat 9.39.2-3: भरतनंदन! वहाँ ब्राह्मणों को दान दो और रात भर वहीं रहकर प्रातःकाल उठकर ऋषियों से आदर पाओ। महाबाहु बलरामजी ने पुनः तीर्थ के जल में स्नान किया और समस्त ऋषियों की अनुमति लेकर शीघ्र ही वहाँ से अन्य तीर्थों को जाने के लिए प्रस्थान कर दिया।   |   mahabharat अध्याय 9.39: औशनस एवं कपालमोचनतीर्थकी माहात्म्यकथा तथा रुषंगुके आश्रम पृथूदकतीर्थकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  9.39.2-3 
दत्त्वा दानं द्विजातिभ्यो रजनीं तामुपोष्य च।
पूजितो मुनिसङ्घैश्च प्रातरुत्थाय लाङ्गली॥ २॥
अनुज्ञाप्य मुनीन् सर्वान् स्पृष्ट्वा तोयं च भारत।
प्रययौ त्वरितो रामस्तीर्थहेतोर्महाबल:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
भरतनंदन! वहाँ ब्राह्मणों को दान दो और रात भर वहीं रहकर प्रातःकाल उठकर ऋषियों से आदर पाओ। महाबाहु बलरामजी ने पुनः तीर्थ के जल में स्नान किया और समस्त ऋषियों की अनुमति लेकर शीघ्र ही वहाँ से अन्य तीर्थों को जाने के लिए प्रस्थान कर दिया।
 
Bharatnandan! Give donations to the brahmins there and after staying there that night, wake up in the morning and be honored by the sages. Balram, the mighty long-armed man, again took a bath in the waters of the Tirtha and after taking the permission of all the sages, he quickly left from there to go to other Tirthas. 2-3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)