अध्याय 39: औशनस एवं कपालमोचनतीर्थकी माहात्म्यकथा तथा रुषंगुके आश्रम पृथूदकतीर्थकी महिमा
श्लोक 1: वैशम्पायनजी कहते हैं: हे राजन! सप्त सारस्वत तीर्थ में निवास करते हुए हलधर बलरामजी ने आश्रम में निवास करने वाले ऋषियों का पूजन किया तथा मंकणक ऋषि पर अपना महान प्रेम प्रकट किया।
श्लोक 2-3: भरतनंदन! वहाँ ब्राह्मणों को दान दो और रात भर वहीं रहकर प्रातःकाल उठकर ऋषियों से आदर पाओ। महाबाहु बलरामजी ने पुनः तीर्थ के जल में स्नान किया और समस्त ऋषियों की अनुमति लेकर शीघ्र ही वहाँ से अन्य तीर्थों को जाने के लिए प्रस्थान कर दिया।
श्लोक 4-5: तत्पश्चात्, हलधारी बलराम औषणतीर्थ में आए, जिसे कपालमोचनतीर्थ भी कहते हैं। महाराज! पूर्वकाल में भगवान राम ने एक राक्षस को मारकर उसे फेंक दिया था। उसका विशाल सिर महोदर ऋषि की जांघ से चिपक गया था। वे महर्षि इसी तीर्थ में स्नान करके उस कपाल से मुक्त हुए थे।
श्लोक 6: महात्मा शुक्राचार्य ने सबसे पहले वहीं तपस्या की थी, जिससे उनके हृदय में नीतिशास्त्र का सारा ज्ञान प्रकट हो गया था ॥6॥
श्लोक 7-8h: वहाँ रहकर उन्होंने दैत्यों और दानवों के युद्ध का विचार किया था। हे राजन! उस महान तीर्थस्थान पर पहुँचकर बलरामजी ने श्रेष्ठ ब्राह्मणों को नियमानुसार धन का दान दिया था।
श्लोक 8-9h: जनमेजय ने पूछा - हे ब्रह्मन्! उस तीर्थ का नाम कपालमोचन कैसे पड़ा, जहाँ महामुनि महोदर को मोक्ष प्राप्त हुआ था? वह सिर उनकी जाँघ से कैसे और किस कारण से चिपक गया?॥8 1/2॥
श्लोक 9-12h: वैशम्पायनजी बोले - नृपश्रेष्ठ! प्राचीन काल की कथा है, जब रघुकुल तिलक महात्मा श्री रामचंद्रजी ने दण्डकारण्य में रहते हुए राक्षसों के संहार का विचार किया, तब उन्होंने जनस्थान में उस दुष्ट राक्षस का सिर तीक्ष्ण धार वाले फरसे से काट डाला। वह कटा हुआ सिर उछलकर उस महान वन में जा पहुँचा और किसी चमत्कार से वन में विचरण कर रहे महोदर मुनि की जंघा पर जा लगा। नरेश्वर! उस समय वह उनकी हड्डी को छेदकर भीतर गहराई में प्रवेश कर गया। 9-11 1/2॥
श्लोक 12-13h: उस सिर के चिपके रहने के कारण वे अत्यंत बुद्धिमान ब्राह्मण किसी तीर्थ या देवालय में सुगमतापूर्वक नहीं जा सकते थे ॥12 1/2॥
श्लोक 13-14h: उस सिर से दुर्गंधयुक्त मवाद बहता रहता था और महोदर ऋषि को बड़ी पीड़ा होती थी। हमने सुना है कि ऋषि किसी तरह पृथ्वी के सभी तीर्थों का भ्रमण कर चुके थे।
श्लोक 14-15: वे महातपस्वी ऋषि समस्त नदियों और समुद्रों में गए और वहाँ रहने वाले पवित्र ऋषियों को सारी घटना सुनाई। समस्त तीर्थों में स्नान करने पर भी वे उस कपाल से छुटकारा न पा सके। ॥14-15॥
श्लोक 16-17h: विप्रवर! उन्होंने ऋषियों से यह महत्त्वपूर्ण बात सुनी कि 'औषणस नाम से प्रसिद्ध सरस्वती का उत्तम तीर्थ समस्त पापों का नाश करने वाला तथा उत्तम सिद्धिदायक है।' 16 1/2॥
श्लोक 17-18: तत्पश्चात् ऋषि ने औषणतीर्थ में जाकर जल से मुँह धोया और स्नान किया। उसी समय वह कपाल उनके पैरों (जांघों) से छूटकर जल में गिर पड़ा॥17-18॥
श्लोक 19: प्रभु! उस सिर या खोपड़ी से मुक्त होकर महोदर मुनि को अपार आनंद हुआ। साथ ही वह सिर (जो उनकी जांघ से गिर गया था) भी जल के भीतर अदृश्य हो गया॥19॥
श्लोक 20: राजन! उस कपाल से मुक्त हुए पापरहित एवं शुद्ध अन्तःकरण वाले महोदर मुनि सुखपूर्वक अपने आश्रम को लौटें॥20॥
श्लोक 21: उस संकट से मुक्त होकर वे महान तपस्वी ऋषि अपने पवित्र आश्रम में गए और वहाँ निवास करने वाले शुद्ध ऋषियों को सारा वृत्तांत सुनाया।
श्लोक 22: तत्पश्चात् वहाँ आये हुए महर्षियों ने महोदर मुनि के वचन सुनकर उस तीर्थ का नाम कपालमोचन रखा।
श्लोक 23: इसके बाद महर्षि महोदर पुनः उस महान तीर्थस्थान पर गए और वहाँ प्रचुर जल पीकर उन्होंने महान सिद्धि (आसक्ति) प्राप्त की।
श्लोक 24: वृष्णिवंशी बलरामजी ने वहाँ ब्राह्मणों का पूजन किया और उन्हें बहुत-सा धन दान दिया। तत्पश्चात् वे ऋषंगु ऋषि के आश्रम में गए॥24॥
श्लोक 25: भरतनन्दन! यहीं पर महर्षि अरिष्टीसेन ने घोर तप किया था और यहीं पर महर्षि विश्वामित्र ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था॥ 25॥
श्लोक 26: हे प्रभु! वह महान आश्रम समस्त इच्छित वस्तुओं से परिपूर्ण है। वहाँ अनेक ऋषि और ब्राह्मण सदैव निवास करते हैं।
श्लोक 27: राजेन्द्र! तत्पश्चात् ब्राह्मणों से घिरे हुए श्री हलधर उस स्थान पर गये, जहाँ रुषंगु ने अपना शरीर त्यागा था।
श्लोक 28-29: भरत! वृद्ध ब्राह्मण रुषंगु सदैव तपस्या में लीन रहते थे। एक बार महातपस्वी रुषंगु मुनि ने शरीर त्यागने का विचार किया और बहुत विचार करने के बाद अपने समस्त पुत्रों को बुलाकर उनसे कहा - 'मुझे पृथूदक तीर्थ में ले चलो'॥28-29॥
श्लोक 30: उन तपस्वी पुत्रों ने तपोधन रुषंगु को बहुत बूढ़ा जानकर उसे सरस्वती के उस उत्तम तीर्थस्थान पर भेज दिया॥30॥
श्लोक 31-33h: राजन! व्याघ्र! जब वे पुत्र ब्राह्मणों के समूहों से सेवित तथा सैकड़ों तीर्थों से सुशोभित उन बुद्धिमान मुनियों को पुण्यमयी सरस्वती के तट पर ले आए, तब उन महातपस्वी महर्षि ने वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके तीर्थ के पुण्य को जानकर अपने पास बैठे हुए समस्त पुत्रों से प्रसन्नतापूर्वक कहा -
श्लोक 33-34h: जो व्यक्ति सरस्वती नदी के उत्तरी तट पर स्थित पृथुदक तीर्थ में जप करते हुए अपना शरीर त्यागता है, उसे भविष्य में फिर कभी मृत्यु का कष्ट नहीं सहना पड़ता।'
श्लोक 34-35h: ब्राह्मणों से प्रेम करने वाले पुण्यात्मा बलराम हलधर ने उस पवित्र स्थान में स्नान करके ब्राह्मणों को बहुत-सा धन दान किया।
श्लोक 35-38: कुरुवंशी राजन्! तत्पश्चात् पराक्रमी एवं तेजस्वी बलभद्रजी उस तीर्थस्थान पर आये जहाँ जगत् के पितामह भगवान ब्रह्मा ने जगत् की रचना की थी, जहाँ कठोर व्रत का पालन करने वाले महामुनि अष्टिषेण ने घोर तप करके ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था और जहाँ महामुनि सिन्धुद्वीपी, महातपस्वी देवापि तथा महातेजस्वी एवं महातपस्वी भगवान विश्वामित्र मुनि ने भी ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था ॥35-38॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥