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mahabharat 9.38.d5-d6h: महादेव! महेश्वर! कमलनयन! आपकी कृपा और आशीर्वाद कभी व्यर्थ नहीं जाते! मैं आपके द्वारा प्रदान की गई सामग्री से ही कार्य करने में समर्थ हूँ, अतः आप सर्वत्र विद्यमान सर्वव्यापी भगवान शंकर की मैं शरण लेता हूँ।'   |   mahabharat अध्याय 9.38: सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति, महिमा और मंकणक मुनिका चरित्र   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 38: सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति, महिमा और मंकणक मुनिका चरित्र  »  श्लोक d5-d6h
 
 
श्लोक  9.38.d5-d6h 
न वृथास्ति महादेव प्रसादस्ते महेश्वर।
यस्मात् त्वयोपकरणात् करोमि कमलेक्षण॥
प्रपद्ये शरणं शम्भुं सर्वदा सर्वत: स्थितम्।)
 
 
अनुवाद
महादेव! महेश्वर! कमलनयन! आपकी कृपा और आशीर्वाद कभी व्यर्थ नहीं जाते! मैं आपके द्वारा प्रदान की गई सामग्री से ही कार्य करने में समर्थ हूँ, अतः आप सर्वत्र विद्यमान सर्वव्यापी भगवान शंकर की मैं शरण लेता हूँ।'
 
Mahadev! Maheshwar! Kamalnayan! Your grace and blessings never go waste! I am able to work only with the materials provided by you, hence I take refuge in you, the omnipresent Lord Shankar who is always present everywhere.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)