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mahabharat 9.38.8: हे राजेन्द्र! धर्म और अर्थ में निपुण पुरुष जो भी बातें मन में सोचता है, वे तुरंत ही उसके सामने प्रकट हो जाती हैं ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 9.38: सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति, महिमा और मंकणक मुनिका चरित्र   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 38: सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति, महिमा और मंकणक मुनिका चरित्र  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  9.38.8 
मनसा चिन्तिता ह्यर्था धर्मार्थकुशलैस्तदा।
उपतिष्ठन्ति राजेन्द्र द्विजातींस्तत्र तत्र ह॥ ८॥
 
 
अनुवाद
हे राजेन्द्र! धर्म और अर्थ में निपुण पुरुष जो भी बातें मन में सोचता है, वे तुरंत ही उसके सामने प्रकट हो जाती हैं ॥8॥
 
Rajendra! Whatever things a person skilled in Dharma and Artha contemplated in his mind, they would instantly appear before him. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)