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श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 38: सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति, महिमा और मंकणक मुनिका चरित्र  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  9.38.7 
तत्र चैव महाराज दीक्षिते प्रपितामहे।
यजतस्तस्य सत्रेण सर्वकामसमृद्धिना॥ ७॥
 
 
अनुवाद
महाराज! उस यज्ञ में स्वयं ब्रह्मा जी ने दीक्षा ली थी। जब उन्होंने यज्ञ किया, तो उस यज्ञ से सभी की मनोकामनाएँ पूर्ण हुईं।
 
Maharaj! Lord Brahma himself had taken initiation in that yajna. When he performed the yajna, everyone's desires were fulfilled by that yajna. 7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)