Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 9.38.56-58: यह सुनकर महादेवजी का हृदय प्रसन्न हो गया। उन्होंने उस ऋषि से पुनः कहा - 'हे ब्राह्मण! मेरे आशीर्वाद से तुम्हारा तप सहस्त्र गुना बढ़ जाए। मैं सदैव इसी आश्रम में तुम्हारे साथ रहूँगा। जो इस सप्तसारस्वत-तीर्थ में मेरा पूजन करेगा, उसके लिए इस लोक या परलोक में कोई भी कार्य कठिन नहीं रहेगा। वह सारस्वत लोक को जाएगा - इसमें संशय नहीं है।' | mahabharat अध्याय 9.38: सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति, महिमा और मंकणक मुनिका चरित्र । mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
ततो देव: प्रीतमनास्तमृषिं पुनरब्रवीत्।
तपस्ते वर्धतां विप्र मत्प्रसादात् सहस्रधा॥ ५६॥
आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वया सार्धमहं सदा।
सप्तसारस्वते चास्मिन् यो मामर्चिष्यते नर:॥ ५७॥
न तस्य दुर्लभं किञ्चिद् भवितेह परत्र वा।
सारस्वतं च ते लोकं गमिष्यन्ति न संशय:॥ ५८॥
अनुवाद
यह सुनकर महादेवजी का हृदय प्रसन्न हो गया। उन्होंने उस ऋषि से पुनः कहा - 'हे ब्राह्मण! मेरे आशीर्वाद से तुम्हारा तप सहस्त्र गुना बढ़ जाए। मैं सदैव इसी आश्रम में तुम्हारे साथ रहूँगा। जो इस सप्तसारस्वत-तीर्थ में मेरा पूजन करेगा, उसके लिए इस लोक या परलोक में कोई भी कार्य कठिन नहीं रहेगा। वह सारस्वत लोक को जाएगा - इसमें संशय नहीं है।'
Hearing this, Mahadevji's heart became pleased. He again said to that sage - 'O Brahmin! May your penance increase a thousandfold with my blessings. I will always live with you in this ashram. For the one who worships me in this Saptasaraswat-tirth, nothing will be difficult for him in this world or the other. He will go to Saraswat Lok - there is no doubt in this.'
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥