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mahabharat 9.38.52: ‘समस्त देवता भी आपको आपके वास्तविक स्वरूप में नहीं जान सकते, फिर मैं आपको कैसे जान सकता हूँ? संसार की समस्त भौतिक वस्तुएँ आपमें ही दिखाई देती हैं॥ 52॥   |   mahabharat अध्याय 9.38: सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति, महिमा और मंकणक मुनिका चरित्र   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 38: सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति, महिमा और मंकणक मुनिका चरित्र  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  9.38.52 
देवैरपि न शक्यस्त्वं परिज्ञातुुं कुतो मया।
त्वयि सर्वे स्म दृश्यन्ते भावा ये जगति स्थिता:॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
‘समस्त देवता भी आपको आपके वास्तविक स्वरूप में नहीं जान सकते, फिर मैं आपको कैसे जान सकता हूँ? संसार की समस्त भौतिक वस्तुएँ आपमें ही दिखाई देती हैं॥ 52॥
 
‘Even all the gods cannot know you in your true form, then how can I know you? All the material things in the world are seen in you.॥ 52॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)